जनपक्षधरता के लिए पत्रकार का एक्टिविस्ट होना भी ज़रूरी है
“आइए हेम चंद्र पांडे को याद करें. हेम एक्टिविस्ट पत्रकारों की उस परंपरा में आते हैं जो जॉन रीड, एडगर स्नो, जैक बेल्डेन, हरीश मुखर्जी, ब्रह्मा बंधोपाध्याय से लेकर सरोज दत्त तक फ़ैली है. इस परंपरा में वे अज्ञात किंतु सचेत पत्रकार भी शामिल हैं जो हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में न्याय के पक्ष में साहस के साथ खड़े हैं.” सुमंतो बनर्जी ने जब पत्रकार हेम चंद्र पांडे के पहले शहादत दिवस पर ये महत्वपूर्ण बातें कही तो लोगों को हेम होने के मतलब को नए सिरे से समझने में मदद मिली.
बहुचर्चित किताब ”इन द वेक ऑफ़ नक्सलबाड़ी” के लेखक और मानवाधिकार आंदोलनों के योद्धा सुमंतो दिल्ली के खचाखच भरे गांधी पीस फाउंडेशन में हेम चंद्र पांडे स्मृति व्याख्यानमाला का पहला व्याख्यान दे रहे थे. सुमंतो ने पत्रकारिता और एक्टिविज्म के रिश्तों को लेकर वैश्विक उदारणों के माध्यम से यह स्थापित किया कि जनपक्षधरता के लिए पत्रकार का एक्टिविस्ट होना भी ज़रूरी है. इस मौक़े पर सुमंतो ने समाचार मीडिया में पत्रकार संगठनों के ख़त्म होने की बात भी उठाई. उन्होंने ज़ोर दिया कि जनपक्षीय पत्रकारिता के लिए पत्रकार संगठनों का मजबूत होना ज़रूरी है. सुमंतो ने एक स्वतंत्र तीसरा प्रेस आयोग बनाकर उसमें आज के संपूर्ण समाचार मीडिया के हालात पर विमर्श करने और नई मीडिया नीति बनाने की मांग पर भी ज़ोर दिया.
हेम को याद करने के लिए बड़ी संख्या में छात्र-नौजवान, प्रोफ़ेसर, पत्रकार, लेखक, फिल्मकार, रंगकर्मी, मानवाधिकार और राजनीतिक कार्यकर्ता जुटे थे. दिल्ली जैसे महानगर में वाम-लोकतांत्रिक ताक़तों का ऐसा विविधता भरा जमावड़ा आम तौर पर बहुत कम देखने को मिलता है. हेम के बहाने यहां मौज़ूद लोगों ने क़रीब चार दशक इकोनोमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में बिताने वाले सत्तर वर्षीय सुंमतों बनर्जी के जीवंत विचारों को सुना. देहरादून में रहने वाले सुमंतो इस कार्यक्रम के लिए ख़ास तौर पर दिल्ली आए थे. देश भर में मानवाधिकारों के हनन के ख़िलाफ़ अनगिनत तथ्यान्वेषी दलों का हिस्सा रहे सुमंतो बनर्जी ने यह भी याद दिलाया कि दिल्ली जैसे महानगरों में काम करने वाले पत्रकारों का उतना दमन नहीं होता जितना संघर्ष के इलाक़ों में काम करने वालों का होता है. उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ऐसे पत्रकारों के सवालों को भी बड़े पैमाने पर उठाने की ज़रूरत है.
व्याख्यान से पहले लेखक और हंस पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव ने भूपेन सिंह द्वारा संपादित किताब, विचारधारा वाला पत्रकार: हेम चंद्र पांडे को लोकार्पित किया. अपने संक्षिप्त वक्तव्य में उन्होंने हेम की शहादत को सलाम किया और देश के बिगड़ते हालात पर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि देश में लगातार एक आपातकाल चल रहा है इसलिए हममें से कोई भी हेम हो सकता है. राजेंद्र यादव ने सभी श्रोताओं के सामने सवाल छोड़ा कि मार्क्सवादी विचारधारा अन्याय के ख़िलाफ़ संघर्ष में तो बहुत सहायक होती है कि लेकिन अब तक दुनियाभर में जो अनुभव रहे हैं, सत्ता में आते ही न्यायप्रिय मार्क्सवादी भी क्यों दमनकारी हो जाते हैं, इस बात पर भी विचार करना चाहिए.
लोकार्पण और सुमंतो के व्याख्यान के बाद विचार-विमर्श का एक महत्वपूर्ण सिलसिला शुरू हुआ. इंसाफ़ की लड़ाईयों में लगातार साथ रहने वाली लेखिका अरुंधति रॉय ने कहा कि हेम चंद्र पांडे के साथ हमें आज़ाद को भी याद करना चाहिए, क्योंकि आज़ाद की हत्या कर सरकार ने माओवादियों के साथ शांतिवार्ता के दरवाजे बंद करने का षडयंत्र रचा था. अरुंधति ने भारतीय राज्य की तुलना पाकिस्तान से की. उन्होंने कहा कि भारत में एक वर्ग कमज़ोर लोकतंत्र और सैनिक हस्तक्षेप के लिए पाकिस्तान का मज़ाक उड़ाता है लेकिन सवाल उठाया जाना चाहिए कि भारत के हालात कौन से बेहतर हैं? कॉरपोरेट हित में सैन्यीकरण की तरफ़ बढ़ रही सरकार की उन्होंने आलोचना की. गरीब आदिवासियों की ज़मीन को विकास के नाम पर कॉरपोरेट्स के हवाले करने पर उन्होंने ऐतराज़ जताया. अपने वक़्तव्य में उन्होंने लोकतंत्र के नाम पर चल रहे दमनतंत्र पर से पर्दा हटाने की कोशिश की.
कवि मंगलेश डबराल ने पत्रकारिता में जनपक्षीय विचारधारा की मौज़ूदगी की वकालत की. उन्होंने कहा कि उदारीकरण के दौर में एक विचारहीन माहौल बनाया जा रहा है, जिसकी आड़ में बाज़ार की विचारधारा अपने हित साध रही है. उन्होंने छोटे-छोटे स्तर पर चल विरोधों को संगठित किए बिना बड़े हस्तक्षेप की कल्पना को नामुमकिन करार दिया. उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी चेतनाशील व्यक्ति तटस्थ नहीं रह सकता. कवि और पत्रकार नीलाभ ने कहा, हेम की हत्या से यह साबित होता है कि भारत एक पुलिसिया राज्य है. उन्होंने पत्रकारों के साथ ही उन लेखकों पर भी निशाना साधा जो स्वांत:सुखाय साहित्य रचने में मस्त रहते हैं. मीडिया विश्लेषक आनंद प्रधान ने इस बात पर चिंता जताई कि प्रेस की आज़ादी के मतलब को किस तरह मीडिया मालिकों ने अपनी मनमानी / आज़ादी में बदल दिया है. उन्होंने पत्रकार संगठनों को खड़ा किए बिना मीडिया के हालात में सुधार को मुश्किल करार दिया.
फिल्मकार संजय काक ने कहा कि हमें वैकल्पिक मीडिया के साथ-साथ मुख्यधारा के मीडिया का भी इस्तेमाल करने की कोशिश करनी चाहिए. उपन्यासकार और समयांतर पत्रिका के संपादक पंकज बिष्ट ने हेम से जुड़ी अपनी पुरानी मुलाक़ातों का ज़िक्र करते हुए कहा कि वे एक प्रतिबद्ध पत्रकार थे उन जैसे पत्रकारों की आज सख़्त ज़रूरत है. तीसरी दुनिया के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा ने मुख्यधारा के मीडिया के समानांतर एक वैकल्पिक सूचना तंत्र विकसित करने पर ज़ोर दिया. उन्होंने बचे-खुचे पत्रकार संगठनों की मनमानी और स्वार्थी प्रवृत्तियों को जनपक्षीय पत्रकारिता के क्षेत्र में एक बड़ी रुकावट करार दिया. कवि और पत्रकार पंकज सिंह ने भी जनता की आवाज़ उठाने वाले पत्रकारों के सामने आने वाली मुश्किलों का जिक्र किया. उन्होंने देश में चल रहे कॉरपोरेट अपराध की गतिविधियों को विस्तार से श्रोताओं के सामने सखा.
हेम के शहादत दिवस पर उनकी जीवन साथी बबीता उप्रेती और भाई राजीव पांडे भी मौज़ूद थे. हेम की याद को ताज़ा रखने के लिए ही हेम के छात्र जीवन के साथियों और हमख़्याल पत्रकारों ने मिलकर हेम चंद्र पांडे मेमोरियल कमेटी बनाई है. इस कमेटी की तरफ़ से हेम के शहादत दिवस पर आयोजित व्याख्यान में मौज़ूद भीड़ इस बात का सबूत थी कि न्याय की आवाज़ों के ख़ून का हिसाब हमारे हुक्मरानों को चुकाना होगा. गांधी पीस फाउंडेशन में मौज़ूद लोगों का जमावड़ा किसी प्रायोजित सरकार या गैरसरकारी सेमीनार की तरह नहीं था. असहमति के अधिकार का सम्मान करने वाली जनवादी ताक़तें वहां स्वेच्छा से मौज़ूद थीं. हेम मेमोरियल कमेटी ने अपील की थी कि इस कार्यक्रम में आपकी उपस्थिति ही प्रतिरोध है.
हेम चंद्र पांडे मेमोरियल कमेटी की तरफ़ से भूपेन सिंह द्वारा ज़ारी.